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Monday, October 28, 2013
Wednesday, October 9, 2013
एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है.................
जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो लल्ला दिन भर, कुछ सपनों का सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते में घबराते हैं,
जब साड़ी पहने लड़की का, इक फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब पूरे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
पर उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
मावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो लल्ला दिन भर, कुछ सपनों का सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाते में घबराते हैं,
जब साड़ी पहने लड़की का, इक फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब पूरे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
पर उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
मावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की काली रातों में गम आंसू के संग घुलता है,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
जब पोथे खाली होते है, जब हर्फ़ सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है,
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है...!!!
Monday, October 7, 2013
कुछ और मांग मेरा हाथ मांगने वाले...
मेरा कलम मेरे ज़ज्बात मांगने वाले...
कुछ और मांग मेरा हाथ मांगने वाले...
तमाम गाँव तेरे भोलेपन पे हसता है,
धुएं के अब्र से बरसात मांगने वाले...
ये लोग कैसे अचानक अमीर बन बैठे,
ये सब थे भीक मेरे साथ मांगने वाले...
कलेजा चाहिए जीने को ऐसे जंगल में,
कुछ और मांग मेरी रात मांगने वाले...
कभी बसंत में प्यासी जड़ों की चीख भी सुन,
लुटे शज़र से हरे पात मांगने वाले...
कुछ और मांग मेरा हाथ मांगने वाले...
तमाम गाँव तेरे भोलेपन पे हसता है,
धुएं के अब्र से बरसात मांगने वाले...
ये लोग कैसे अचानक अमीर बन बैठे,
ये सब थे भीक मेरे साथ मांगने वाले...
कलेजा चाहिए जीने को ऐसे जंगल में,
कुछ और मांग मेरी रात मांगने वाले...
कभी बसंत में प्यासी जड़ों की चीख भी सुन,
लुटे शज़र से हरे पात मांगने वाले...
Tuesday, June 25, 2013
Sunday, April 28, 2013
Sun Raha Hai Lyrics
Sun Raha Hai Lyrics
Apne karam ki karagaahein
Yaara, Yaara, yaara
Mujhko iraade de
Kasamein de, vaade de
Meri duaaon ke ishaaron ko sahare de
Dil ko thikaane de
Naye bahaane de
Khaabon ki baarishon ko
Mausam ke paimaane de
Apne karam ki karagaahein
Kar de idhar bhi tu nigaahein
Sunn raha hai na tu
Ro raha hoon main
Sun raha hai na tu
Kyun ro raha hoon main
Sunn raha hai na tu
Ro raha hoon main
Sun raha hai na tu
Kyun ro raha hoon main
Mazilein ruswaa hain [ruswaa hain]
Khoya hai raasta
Aaye le jaaye [le jaaye]
Itni si iltazaa
Yeh meri zamaanat hai
Tu meri amaanat hai.. haan..
Apne karam ki karagaahein
Kar de idhar bhi tu nigaahein
Sun raha hai na tu
Ro raha hoon main
Sun raha hai na tu
Kyun ro raha hoon main
Waqt bhi theharaa hai
Kaise kyun yeh hua
Kaash tu aise aaye
Jaise koi dua
Tu rooh ki rahat hai
Tu meri ibaadat hai
Apne karam ki karagaahein
Kar de idhar bhi tu nigaahein
Sun raha hai na tu
Ro raha hoon main
Sun raha hai na tu
Kyun ro raha hoon main
Sun raha hai na tu
Ro raha hoon main
Sun raha hai na tu
Kyun ro raha hoon main
Yaaraa....
Thursday, April 18, 2013
उसी गाँव में चलते है.....
बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है।
तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है॥
वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ।
और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ॥
वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है।
यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है॥
यहाँ कोठी है बंगले है और कार है।
वहां परिवार है और संस्कार है॥
यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है।
वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है॥
यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ।
वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ॥
यहाँ रात को बहार निकलने में दहशत है...
मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है।
तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है॥
वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है।
चल आज हम उसी गाँव में चलते है.....
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