Monday, October 7, 2013

इश्क न हो बस इतना एहसान करदे दाता! दिल को पत्थर सामान करदे!

इश्क न हो बस इतना एहसान करदे 
दाता! दिल को पत्थर सामान करदे!

माँ बाबा,भाई सब परेशां हो जाते हैं 
मेरे ख्यालों से भी हैरान हो जाते हैं 

मेरी आँखों के सपने उन्हें भाते नहीं 
इसलिए पलके मेरी वो मुंदा जाते हैं 

दाता! ये सब तेरी करनी का ही फल 
जिसकी भेट मुझे ये चढ़ा जाते हैं .... 
प्यार और इश्क भी गर तेरी इबादत हैं 
फिर क्यों जात-पात में प्रेमी मारे जाते हैं?

अब किसी मोह्हबत का ऐसा ढंग न हो,
इश्क न हो बस इतना एहसान करदे !!
दिल तो हो पर उसमे कोई उमंग न हो 
दाता! दिल को पत्थर सामान करदे !!

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